वास्कोडिगामा की दूसरी भारत यात्रा कब हुई थी?
नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम जानेंगे कि वास्कोडिगामा ने अपनी दूसरी भारत यात्रा कब की थी? वास्कोडिगामा की दूसरी भारत यात्रा कितनी सफल रही? और वास्कोडिगामा ने अपनी दूसरी भारत यात्रा में क्या क्या महत्वपूर्ण कार्य किया?
सितम्बर 1498 में वास्कोडिगामा लिस्बन वापस लौट गया, लिस्बन में वास्को का भव्य स्वागत किया गया। वास्कोडिगामा ने अपना सारा वृतांत राजा मैनुएल को बताया। वास्को को भारत के इसाई अलग लगे जो पुर्तगालियों को पहचान न सके। मालाबार तट पर मुस्लिमों की उपस्थिति से भी उसे असुविधा हुई। अफ्रीका और अरब देशों में मुस्लिम शासन और मुस्लिम व्यापारियों की तादाद सुनकर राजा मैनुएल को अपने ईसाई कर्तव्य की याद आई और दो साल के अन्दर ही उसने दो और मिशन भेज दिया।
मार्च 1500 इस्वी में पेद्रो अल्वारेज़ काब्राल के निर्देशन में 13 जहाज़ लिस्बन (पुर्तगाल) से चले। उनका उद्देश्य अफ्रीका और भारत में फैक्ट्री लगाकर उपनिवेश करना, और जामोरिन को कहकर मुस्लिम व्यापारियों को भगा देना था। लेकिन उत्तमाशा अंतरीप पर पहुँचने के बाद वास्को के बताए हुए मार्ग भटककर जहाज़ अलग-अलग खो गए। काब्राल किसी तरह कालीकट (भारत) पहूँचा। और नए जामोरिन ने यूरोपीय जहाज़ का व्यापारिक सौदा स्वीकार किया और सुरक्षा की जिम्मेदारी का आश्वासन दिया। लेकिन उस साल अरब व्यापारी व्यापार के सिलसिले से पत्तन में पहले से ही पहुँच चुके थे, काब्राल ने जामोरिन से यह कहकर अरब व्यापारियों के जहाज़ को पकड़ लिया कि यह हमारे साथ हुई व्यापार समझौते का उलंघन है। और इसके जवाब में उन्होंने पुर्तगाली फैक्ट्री के सभी 70 पुर्तगालियों को मार डाला।
लेकिन अभी भी काब्राल की यात्रा असफल नहीं थी। इससे पहले कि वह लिस्बन लौट पाता, मैनुएल प्रथम होआओ द नोवा के नेतृत्व में चार जहाजों के साथ लिस्बन से निकल पड़ा। अफ्रीका के तट पर मैनुएल प्रथम को काब्राल का फटे जूते में छोड़ा हुआ संदेश मिला, और वह कालीकट (भारत) पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने कई मुस्लिम जहाजों पर आक्रमण किया, और कुन्नूर में एक फैक्ट्री लगवाकर वापस लिस्बन (पुर्तगाल) लौट गया।
सन् 1502 इस्वी वास्कोडिगामा की दूसरी भारत यात्रा
सन् 1502 इस्वी में वास्कोडिगामा फिर दूसरी बार भारत की यात्रा पर निकला, और उसे जब यह पता चला कि कालीकट के लोगों ने पीछे छूट गए सभी पुर्तगालियों को मार दिया तो उसने अपनी यात्रा के मार्ग में मिलने वाले सभी भारतीय और अरब जहाजों को ध्वस्त कर डाला। और कालीकट पहुँच कर बहुत सी संपत्ति को अपने अधिकार में कर लिया। अपनी इस यात्रा में वह कोचीन, कुन्नूर और गोवा भी गया, और वहाँ रह रहे इसाईयों का पता लगाया। और यहाँ कुछ पुर्तगालियों को छोड़ कर वह लिस्बन वापस लौट गया।
इस तरह से उसकी दूसरी यात्रा राजा मैनुएल के हिसाब से सफल रही। क्योंकि वह अरब व्यापारियों से कड़ी लड़ाई लड़ी और जामोरिन को व्यापार के लिए मजबूर किया। और भारत में रह रहे इसाईयों का भी पता लगाया। राजा उसकी इस बात से बहुत प्रसन्न हुआ।
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