Wednesday, 1 November 2023

भारत की खोज कब और किसने की?

 भारत की खोज कब और किसने की?

नमस्कार दोस्तों आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम जानेंगे कि भारत की खोज कब और किसने की? वास्को डी गामा कौन था? वास्कोडिगामा का जीवन परिचय? और वास्कोडिगामा की पहली भारत यात्रा? तो आइये जानते हैं कि भारत की खोज के बारे में? 


भारत को पारंपरिक अर्थों में "खोजा" नहीं गया था, क्योंकि इसकी सभ्यता का एक लंबा इतिहास हजारों साल पुराना है। भारतीय उपमहाद्वीप हजारों वर्षों से बसा हुआ है।


भारत एक ऐसा देश है जो युगों से जाना जाता है, लेकिन बात की जाये कि दुनिया में भारत की खोज कब और किसने की? तो इसका श्रेय पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा को जाता है।


वास्को डी गामा कौन था? प्रारम्भिक जीवन! 


वास्को डी गामा एक पुर्तगाली नाविक और खोजकर्ता था जिसने यूरोप से भारत तक पहली सीधी समुद्री यात्रा करके इतिहास रचा था। वास्कोडिगामा का जन्म लगभग 1460 ई. में साइंस, पुर्तगाल के दक्षिण-पश्चिम तट के पास हुआ था। वास्कोडिगामा के पिता एस्तेवाओ डिगामा डाॅम फर्नैन्डो के यहाँ नाइट थे। डाॅम फर्नैन्डो साइंस नगर का राज्यपाल था। वास्कोडिगामा के पिता साइंस के कुछ साबुन कारखानों से कर वसुलने का काम करते थे। वास्कोडिगामा की माता का नाम डोना इसाबेल साॅद्रे था। वास्कोडिगामा के परिवार की और अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।


वास्को डी गामा की पहली भारत यात्रा


वास्को डी गामा 8 जुलाई 1497 को चार जहाज़ी बेड़ों के साथ लिस्बन से चला था। और यहीं से उसकी पहली भारत यात्रा आरंभ हुई थी। इन जहाज़ी बेड़ों में लगभग 170 लोग शामिल थे,  इनमें कुछ महत्वपूर्ण नाम मार्तिम अफ़ोन्सो और फ़र्नाओ मार्टिन्स का था। मार्टिन्स को मोरक्को की जेल में रहने के कारण अरबी भाषा का ज्ञान था जबकि अफ़ोन्सो कांगों में रहा करता था इसलिए वह अफ्रीकी बोलियों को जानता था। इसके अलावा इस यात्रा में लगभग दस से बारह अभियुक्त राजा के तरफ से शामिल किए गए थे, जिनको खतरनाक जगहों की जानकारी और खोजी कामों का जिम्मा सौंपा गया था।


अपनी चार माह की यात्रा पूरी करने के बाद वे 22 नवम्बर को उत्तमाशा अंतरीप पहुँचे। यहाँ कुछ दिन वे लोग रुके और जहाजों की मरम्मत की। उसके बाद 7 दिसम्बर को वो वहां से चले। जनवरी में ये वर्तमान मोज़ाम्बीक तक पहुँच गए थे, जो पूर्वी अफ़्रीका का एक तटीय क्षेत्र है जिस पर अरब व्यापारियों का नियंत्रण था। यहाँ के स्थानीय लोगों को जब पता चला कि ये मुसलमान नही हैं तो उनका पीछा किया जिसके कारण वास्को और उसके लोग कीनिया की ओर चल पड़े। कीनिया के मोम्बासा में भी उसका विरोध हुआ। जहाज को तट से दूर रखकर कुछ नाविक शहर के दौरे पर गए जहाँ उनकी मुलाकात ईसाईयों से हुई। और उन्हें पता चला कि मोजाम्बिक से खबर मिलने के बाद वहाँ के सुल्तान ने उन्हें फसाने के लिए योजना बना रखी है। वास्को वहाँ से किसी तरह भाग निकला और अब उसे भारत पहुँचने के लिए दिशाओं के जानकार नाविकों की जरूरत थी। इसके लिए उसने एक छोटी नाव पर आ रहे कुछ लोगों को पकड़ लिया। और पूछताछ की तो एक व्यापारी ने बताया कि पास के तट मलिंदी में भारतीय नाविक रहते हैं। वहाँ से वास्को मलिंदी पहुँचा। यहाँ से उसने एक भारतीय मार्गदर्शक को अपने साथ काम पर रखा जिसने पुर्तगालियों के भारत पहुँचने का मार्गदर्शन किया।

 
आखिरकार 20 मई 1498 में, वास्कोडिगामा हिंद महासागर के पार नौकायन करते हुए सफलतापूर्वक कालीकट (भारत के केरल में वर्तमान कोझीकोड) के बंदरगाह पर पहुँचा। वास्कोडिगामा को यहाँ राजा समुदिरी ने उन्हें कालीकट के पत्तन पर आने का न। न्यौता दिया और वास्को का कालीकट में संगीत के साथ भव्य स्वागत किया। वास्को डी गामा की इस महत्वपूर्ण उपलब्धि ने भारत के लिए एक आकर्षक समुद्री मार्ग का रास्ता खोल दिया, जिससे मध्यस्थों द्वारा नियंत्रित भूमि मार्गों पर भरोसा किए बिना सीधे व्यापार और मसालों और पूर्व के अन्य मूल्यवान सामानों तक पहुंच संभव हो सका। वास्को डी गामा के इस अभियान ने हिंद महासागर में पुर्तगाली व्यापार प्रभुत्व की स्थापना और उसके बाद पश्चिमी तट पर गोवा सहित भारत के कुछ हिस्सों के उपनिवेशीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।


वास्कोडिगामा सितम्बर 1498 में वापस पुर्तगाल लौट गया। जहाज पर काफी दिन गुज़रने के कारण लोग थक और बिमार हो गए थे। घर से करीब दो सप्ताह की दूरी पर रहने के समय उसका भाई और पाॅलो द गामा बिमार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। वास्को ने बाकी जहाजों को लिस्बन लौट जाने का आदेश दिया, और भाई को दफ़नाने के बाद अपने दल के साथ लिस्बन पहुँचा। और वहाँ उसका भव्य स्वागत किया गया।

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