Monday, 13 November 2023

वास्कोडिगामा की तीसरी भारत यात्रा कब हुई थी?

वास्कोडिगामा की तीसरी भारत यात्रा कब हुई थी? 

नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम जानेंगे कि वास्कोडिगामा की तीसरी भारत यात्रा कब हुई थी? वास्कोडिगामा तीसरी बार भारत कब आया था? वास्कोडिगामा की मृत्यु कब और कैसे हुई थी? वास्कोडिगामा की तीसरी भारत यात्रा कितनी महत्वपूर्ण थी? 

वास्कोडिगामा ने तीसरी बार भारत यात्रा सन् 1524 इस्वी में की थी। यह उसकी तीसरी और अंतिम भारत यात्रा थी। तीसरी बार वह पुर्तगाल की भारत में उपनिवेश बस्ती के वाइसरॉय (राज्यपाल) के रूप में आया था। भारत पहुँचने के कुछ समय पश्चात् मलेरिया हो जाने के कारण दिसंबर 1524 इस्वी में उसकी मृत्यु हो गई। उसके मरने के पश्चात् उसके पार्थिव शरीर को कोच्चि (भारत) में ही दफना दिया गया। 


वास्कोडिगामा की यात्रा के महत्वपूर्ण पहलु

वास्कोडिगामा पुर्तगाल के राजकुमार और अन्वेषक हेनरी के बाद सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक खोजकर्ता था। जिसने दो महासागरों और तीन महादेशों को पार कर अरब सागर में अरब व्यापारियों और अफ्रीकी साम्राज्य के लोगों से लड़ कर आगे बढ़ा और भारत पहुँचने का साहस किया। भारत आकर अपने साथ लाए पुर्तगाली राज-संदेश तथा उसकी रक्षा के लिए राजा (जा़मोरिन)  से युद्ध और सफलता उसके दृढ़-निश्चय का परिचय था। 


वास्कोडिगामा के भारत पहुँचने पर अरब और मूर के व्यापारियों के मसालों के व्यापार को काफी नुकसान पहुंचा।  इस व्यापार को पाने के लिए वास्कोडिगामा ने एक लम्बी और परिश्रमी यात्रा की, कई लड़ाईयां भी लड़ी, अधिकांश लड़ाईयों में वह अपनी बेहतर बन्दूको की सहायता से सफल भी रहा। जिससे अरब, ईरान, कालीकट जल व्यापार मार्ग कमज़ोर पड़ गया। उसकी इस सफलता के बाद राजा मैनुएल ने भारत सहित पूर्व के कई और मिशन चलाए। 

Saturday, 4 November 2023

वास्कोडिगामा की दूसरी भारत यात्रा कब हुई थी?

वास्कोडिगामा की दूसरी भारत यात्रा कब हुई थी?

नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम जानेंगे कि वास्कोडिगामा ने अपनी दूसरी भारत यात्रा कब की थी? वास्कोडिगामा की दूसरी भारत यात्रा कितनी सफल रही? और वास्कोडिगामा ने अपनी दूसरी भारत यात्रा में क्या क्या महत्वपूर्ण कार्य किया?

 
सितम्बर 1498 में  वास्कोडिगामा लिस्बन वापस लौट गया, लिस्बन में वास्को का भव्य स्वागत किया गया। वास्कोडिगामा ने अपना सारा वृतांत राजा मैनुएल को बताया। वास्को को भारत के इसाई अलग लगे जो पुर्तगालियों को पहचान न सके। मालाबार तट पर मुस्लिमों की उपस्थिति से भी उसे असुविधा हुई। अफ्रीका और अरब देशों में मुस्लिम शासन और मुस्लिम व्यापारियों की तादाद सुनकर राजा मैनुएल को अपने ईसाई कर्तव्य की याद आई और दो साल के अन्दर ही उसने दो और मिशन भेज दिया।

 
मार्च 1500 इस्वी में पेद्रो अल्वारेज़ काब्राल के निर्देशन में 13 जहाज़ लिस्बन (पुर्तगाल) से चले। उनका उद्देश्य अफ्रीका और भारत में फैक्ट्री लगाकर उपनिवेश करना, और जामोरिन को कहकर मुस्लिम व्यापारियों को भगा देना था। लेकिन उत्तमाशा अंतरीप पर पहुँचने के बाद वास्को के बताए हुए मार्ग भटककर जहाज़ अलग-अलग खो गए। काब्राल किसी तरह कालीकट (भारत) पहूँचा। और नए जामोरिन ने यूरोपीय जहाज़ का व्यापारिक सौदा स्वीकार किया और सुरक्षा की जिम्मेदारी का आश्वासन दिया। लेकिन उस साल अरब व्यापारी व्यापार के सिलसिले से पत्तन में पहले से ही पहुँच चुके थे, काब्राल ने जामोरिन से यह कहकर अरब व्यापारियों के जहाज़ को पकड़ लिया कि यह हमारे साथ हुई व्यापार समझौते का उलंघन है। और इसके जवाब में उन्होंने पुर्तगाली फैक्ट्री के सभी 70 पुर्तगालियों को मार डाला।

 
लेकिन अभी भी काब्राल की यात्रा असफल नहीं थी। इससे पहले कि वह लिस्बन लौट पाता, मैनुएल प्रथम होआओ द नोवा के नेतृत्व में चार जहाजों के साथ लिस्बन से निकल पड़ा। अफ्रीका के तट पर मैनुएल प्रथम को काब्राल का फटे जूते में छोड़ा हुआ संदेश मिला, और वह कालीकट (भारत) पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने कई मुस्लिम जहाजों पर आक्रमण किया, और कुन्नूर में एक फैक्ट्री लगवाकर वापस लिस्बन (पुर्तगाल) लौट गया।


सन् 1502 इस्वी वास्कोडिगामा की दूसरी भारत यात्रा

सन् 1502 इस्वी में वास्कोडिगामा फिर दूसरी बार भारत की यात्रा पर निकला, और उसे जब यह पता चला कि कालीकट के लोगों ने पीछे छूट गए सभी पुर्तगालियों को मार दिया तो उसने अपनी यात्रा के मार्ग में मिलने वाले सभी भारतीय और अरब जहाजों को ध्वस्त कर डाला। और कालीकट पहुँच कर बहुत सी संपत्ति को अपने अधिकार में कर लिया। अपनी इस यात्रा में वह कोचीन, कुन्नूर और गोवा भी गया, और वहाँ रह रहे इसाईयों का पता लगाया। और यहाँ कुछ पुर्तगालियों को छोड़ कर वह लिस्बन वापस लौट गया।

 
इस तरह से उसकी दूसरी यात्रा राजा मैनुएल के हिसाब से सफल रही। क्योंकि वह अरब व्यापारियों से कड़ी लड़ाई लड़ी और जामोरिन को व्यापार के लिए मजबूर किया। और भारत में रह रहे इसाईयों का भी पता लगाया।  राजा उसकी इस बात से बहुत प्रसन्न हुआ।

Wednesday, 1 November 2023

भारत की खोज कब और किसने की?

 भारत की खोज कब और किसने की?

नमस्कार दोस्तों आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम जानेंगे कि भारत की खोज कब और किसने की? वास्को डी गामा कौन था? वास्कोडिगामा का जीवन परिचय? और वास्कोडिगामा की पहली भारत यात्रा? तो आइये जानते हैं कि भारत की खोज के बारे में? 


भारत को पारंपरिक अर्थों में "खोजा" नहीं गया था, क्योंकि इसकी सभ्यता का एक लंबा इतिहास हजारों साल पुराना है। भारतीय उपमहाद्वीप हजारों वर्षों से बसा हुआ है।


भारत एक ऐसा देश है जो युगों से जाना जाता है, लेकिन बात की जाये कि दुनिया में भारत की खोज कब और किसने की? तो इसका श्रेय पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा को जाता है।


वास्को डी गामा कौन था? प्रारम्भिक जीवन! 


वास्को डी गामा एक पुर्तगाली नाविक और खोजकर्ता था जिसने यूरोप से भारत तक पहली सीधी समुद्री यात्रा करके इतिहास रचा था। वास्कोडिगामा का जन्म लगभग 1460 ई. में साइंस, पुर्तगाल के दक्षिण-पश्चिम तट के पास हुआ था। वास्कोडिगामा के पिता एस्तेवाओ डिगामा डाॅम फर्नैन्डो के यहाँ नाइट थे। डाॅम फर्नैन्डो साइंस नगर का राज्यपाल था। वास्कोडिगामा के पिता साइंस के कुछ साबुन कारखानों से कर वसुलने का काम करते थे। वास्कोडिगामा की माता का नाम डोना इसाबेल साॅद्रे था। वास्कोडिगामा के परिवार की और अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।


वास्को डी गामा की पहली भारत यात्रा


वास्को डी गामा 8 जुलाई 1497 को चार जहाज़ी बेड़ों के साथ लिस्बन से चला था। और यहीं से उसकी पहली भारत यात्रा आरंभ हुई थी। इन जहाज़ी बेड़ों में लगभग 170 लोग शामिल थे,  इनमें कुछ महत्वपूर्ण नाम मार्तिम अफ़ोन्सो और फ़र्नाओ मार्टिन्स का था। मार्टिन्स को मोरक्को की जेल में रहने के कारण अरबी भाषा का ज्ञान था जबकि अफ़ोन्सो कांगों में रहा करता था इसलिए वह अफ्रीकी बोलियों को जानता था। इसके अलावा इस यात्रा में लगभग दस से बारह अभियुक्त राजा के तरफ से शामिल किए गए थे, जिनको खतरनाक जगहों की जानकारी और खोजी कामों का जिम्मा सौंपा गया था।


अपनी चार माह की यात्रा पूरी करने के बाद वे 22 नवम्बर को उत्तमाशा अंतरीप पहुँचे। यहाँ कुछ दिन वे लोग रुके और जहाजों की मरम्मत की। उसके बाद 7 दिसम्बर को वो वहां से चले। जनवरी में ये वर्तमान मोज़ाम्बीक तक पहुँच गए थे, जो पूर्वी अफ़्रीका का एक तटीय क्षेत्र है जिस पर अरब व्यापारियों का नियंत्रण था। यहाँ के स्थानीय लोगों को जब पता चला कि ये मुसलमान नही हैं तो उनका पीछा किया जिसके कारण वास्को और उसके लोग कीनिया की ओर चल पड़े। कीनिया के मोम्बासा में भी उसका विरोध हुआ। जहाज को तट से दूर रखकर कुछ नाविक शहर के दौरे पर गए जहाँ उनकी मुलाकात ईसाईयों से हुई। और उन्हें पता चला कि मोजाम्बिक से खबर मिलने के बाद वहाँ के सुल्तान ने उन्हें फसाने के लिए योजना बना रखी है। वास्को वहाँ से किसी तरह भाग निकला और अब उसे भारत पहुँचने के लिए दिशाओं के जानकार नाविकों की जरूरत थी। इसके लिए उसने एक छोटी नाव पर आ रहे कुछ लोगों को पकड़ लिया। और पूछताछ की तो एक व्यापारी ने बताया कि पास के तट मलिंदी में भारतीय नाविक रहते हैं। वहाँ से वास्को मलिंदी पहुँचा। यहाँ से उसने एक भारतीय मार्गदर्शक को अपने साथ काम पर रखा जिसने पुर्तगालियों के भारत पहुँचने का मार्गदर्शन किया।

 
आखिरकार 20 मई 1498 में, वास्कोडिगामा हिंद महासागर के पार नौकायन करते हुए सफलतापूर्वक कालीकट (भारत के केरल में वर्तमान कोझीकोड) के बंदरगाह पर पहुँचा। वास्कोडिगामा को यहाँ राजा समुदिरी ने उन्हें कालीकट के पत्तन पर आने का न। न्यौता दिया और वास्को का कालीकट में संगीत के साथ भव्य स्वागत किया। वास्को डी गामा की इस महत्वपूर्ण उपलब्धि ने भारत के लिए एक आकर्षक समुद्री मार्ग का रास्ता खोल दिया, जिससे मध्यस्थों द्वारा नियंत्रित भूमि मार्गों पर भरोसा किए बिना सीधे व्यापार और मसालों और पूर्व के अन्य मूल्यवान सामानों तक पहुंच संभव हो सका। वास्को डी गामा के इस अभियान ने हिंद महासागर में पुर्तगाली व्यापार प्रभुत्व की स्थापना और उसके बाद पश्चिमी तट पर गोवा सहित भारत के कुछ हिस्सों के उपनिवेशीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।


वास्कोडिगामा सितम्बर 1498 में वापस पुर्तगाल लौट गया। जहाज पर काफी दिन गुज़रने के कारण लोग थक और बिमार हो गए थे। घर से करीब दो सप्ताह की दूरी पर रहने के समय उसका भाई और पाॅलो द गामा बिमार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। वास्को ने बाकी जहाजों को लिस्बन लौट जाने का आदेश दिया, और भाई को दफ़नाने के बाद अपने दल के साथ लिस्बन पहुँचा। और वहाँ उसका भव्य स्वागत किया गया।

वास्कोडिगामा की तीसरी भारत यात्रा कब हुई थी?

वास्कोडिगामा की तीसरी भारत यात्रा कब हुई थी?  नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम जानेंगे कि वास्कोडिगामा की तीसरी भारत यात्रा कब हुई थी? वा...